परमा एकादशी क्यों मनाई जाती है? जानें यह पौराणिक व्रत कथा

Parama Ekadashi Vrat: साल भर में 24 एकादशियां आती हैं और हर एक एकादशी का खास महत्व होता है. इसमें परमा एकादशी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. अधिक मास या मलमास में कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी के नाम से जाता है. परमा एकादशी के दिन पूरे विधि विधान से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है.

परमा एकादशी का व्रत करने से भक्तों को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है. इस साल यह एकादशी 12 अगस्त, शनिवार के दिन मनाई जाएगी. आइए जानते हैं परमा एकादशी से जुड़ी व्रत कथा.

परमा एकादशी की व्रत कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन को परमा एकादशी व्रत का महत्व बताते हुए इस कथा का वर्णन किया था. परमा एकादशी की व्रत कथा के अनुसार, प्राचीन काल में काम्पिल्य नगर में सुमेधा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था. ब्राम्हण की पत्नी का नाम पवित्रा था. वह परम सती और साध्वी स्वभाव की थी. 

यह दोनों पति-पत्नी दरिद्रता और निर्धनता में जीवन निर्वाह करते थे लेकिन यह लोग बहुत धार्मिक थे और अतिथि सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे. एक दिन अपनी गरीबी से परेशान होकर ब्राह्मण ने परदेश जाने का विचार किया लेकिन उसकी पत्नी ने उसे समझाते हुए  कहा कि धन और संतान पूर्वजन्म के दान से ही प्राप्त होते हैं, इसलिए आप इसकी चिंता करना छोड़ दीजिए.

एक दिन इस ब्राम्हण के घर महर्षि कौडिन्य आए. ब्राह्मण दंपति ने पूरे तन-मन से उनकी सेवा की. उनकी दशा देखते हुए महर्षि ने उन्हें परमा एकादशी का व्रत करने को कहा. उन्होंने दरिद्रता को दूर करने के लिए दोनों को साथ मिलकर अधिक मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण करने की सलाह दी. उन्होंने बताया कि इस एकादशी के व्रत से यक्षराज कुबेर धनाधीश बना है और हरिशचंद्र राजा हुआ है.

ऐसा कहकर मुनि वहां से चले गए. इसके बाद सुमेधा ने अपनी पत्नी के साथ यह व्रत किया. पौराणिक कथा के अनुसार व्रत के पारण के अगले दिन प्रात: काल में एक राजकुमार घोड़े पर चढ़कर आया और उसने सुमेधा को एक अच्छा घर रहने के लिए दिया और उसे सारी सुख-सुविधाओं से भर दिया. इस व्रत को करने के बाद से इनके सारे दुख- दर्द दूर हो गए.

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